सिपाही – मैं आपको इस मकान के बाहर ले चलूंगा मगर इसकी मजदूरी भी तो मुझे मिलनी चाहिए।
आनंद – जो कहिए दूंगा।
सिपाही – आपके पास क्या है जो मुझे देंगे
आनंद – इस वक्त भी हजारों रुपये का माल मेरे बदन पर है।
सिपाही – मैं यह सब-कुछ नहीं चाहता।
आनंद – फिर
सिपाही – उसी कम्बख्त के बदन पर जो कुछ जेवर हैं मुझे दीजिए और एक हजार अशर्फी।
आनंद – यह कैसे हो सकेगा वह तो यहां मौजूद नहीं है और हजार अशर्फी भी कहां से आवें
सिपाही – उसी से लेकर दीजिए।
आनंद – क्या वह मेरे कहने से देगी?
सिपाही – (हंसकर) वह तो आपके लिए जान देने को तैयार है, इतनी रकम की क्या बिसात है।
आनंद – तो क्या आप मुझे यहां से न छुड़ावेंगे!
सिपाही – नहीं, मगर आप कोई चिंता न करें, आपका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता, कल जब वह रांड़ आवे तो उससे कहिए कि तुमसे मुहब्बत तब करूंगा जब अपने बदन का कुल जेवर और एक हजार अशर्फी यहां रख दो, उसके दूसरे दिन आओ तो जो कहोगी मैं मानूंगा। तुरंत अशर्फी मंगा देगी और कुल जेवर भी उतार देगी। नालायक बड़ी मालदार है, उसे कम न समझिये।
आनंद – खैर जो कहोगे करूंगा।
सिपाही – जब तक आप यह न करेंगे मैं आपको इस कैद से न छुड़ाऊंगा। आप यह न सोचिये कि उसे धोखा देकर या जबर्दस्ती उस राह से चले जायंगे जिधर से वह आती-जाती है। यह कभी नहीं हो सकेगा, उसके आने-जाने के लिए कई रास्ते हैं।