गोविन्द कबहुं मिले पिया मेरा

गोबिन्द कबहुं मिलै पिया मेरा॥

चरण कंवल को हंस हंस देखूं,
राखूं नैणां नेरा।
गोबिन्द,  राखूं नैणां नेरा।

व्याकुल प्राण धरत नहिं धीरज,
मिल तूं मीत सबेरा।
गोबिन्द,  मिल तूं मीत सबेरा।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर
ताप तपन बहुतेरा॥
गोबिन्द,  ताप तपन बहुतेरा॥

खुद तो बाहर ही खड़े रहे

महाभारत का एक प्रसंग है, एक दिन दुर्योधन ने भीष्म पितामह को बहुत बुरा-भला कहा . उन्होंने आवेश में आकर प्रतिज्ञा की कि कल पाँचो पाण्डवों को मार दूँगा. 

उसके बाद क्या होता है , ये सुनिए गीत :

खुद तो बाहर ही खड़े रहे, भीतर भेजा पांचाली को;
यतिवर बाबा के चरणों में, जाकर अपना मस्तक रख दो ।

अर्धरात्रि की बेला में, भीषम की लगी समाधी थी;
मन प्रभु चरणों में लगा हुआ, उस जगह न कोई व्याधा थी ।

कृष्णा ने जाकर सिर रक्खा, चरणों पर भीष्म पितामह के;
चरणों पर कौन झुका, देखूँ, बाबा भीषम एकदम चौंके ।

देखा एक सधवा नारी है, चरणों पर शीश झुकाती है;
उसके तन की रंगी साड़ी, सधवापन को दर्शाती है ।

आशीर्वाद मुख से निकला, सौभाग्यवती भव हो बेटी;
तेरे हाथों की मेहंदी का न रंग कभी छूटे बेटी ।

सौभाग्य तुम्हारा अचल रहे, सिन्दूर से मांग न खाली हो;
वर देता हूँ तुझको बेटी, तू वीर कुमारों वाली हो ।

सुनकर कृष्णा ने तुरत कहा, बाबा ये क्या बतलाते हो;
कल और आज कुछ और कहा, तुम सत्यव्रती कहलाते हो ।

मेहंदी का रंग तो रहने दो, साड़ी का रंग उड़ाओ ना;
सिन्दूर जो मेरी मांग का है, बाणों से उसे छुड़ाओ ना ।

मेरे पाँचों पतियों में से, यदि एक भी मारा जायेगा;
आशीर्वाद तेरा बाबा, क्या झूठा नहीं कहायेगा ।

तब आया होश पितामह को, हाथों से माला छूट गई;
मन प्रभु चरणों में लगा हुआ, चितचोर समाधी टूट गई ।

बोले बेटी इन प्रश्नों का उत्तर पीछे दे पाउंगा;
तेरे सुहाग का निर्णय भी मैं पीछे ही कर पाउंगा ।

एक बात खटकती है मन में, हैरान है जिसने कर डाला;
बतला बेटी, वह कहाँ छिपा, इस जगह तुझे लाने वाला ।

बेटी तूने मेरे कुल को, इतना पवित्र कर डाला है;
पहरा देता होगा तेरा, जो विश्व रचाने वाला है    ।

बूढ़ा होने को आया है, पर अब भी गई नहीं चोरी;
नित नई नीतियाँ चलता है, तुमसे चोरी, मुझसे चोरी ।

बाहर आकर के जो देखा, ड्योढ़ी का दृश्य निराला था;
पीताम्बर का घूंघट डाले, वो खड़ा बांसुरी वाला था ।

चरणों से जाकर लिपट गये, छलिया छलने को आया है;
भक्तों की रक्षा करने को, दासी का वेष बनाया है ।

*

कहते हैं द्रौपदी का जूता था, पीताम्बर के कोने में;
उर में करुणा का भार लिये थे लगे पितामह रोने में ।   

हे द्रुपद सुता, मेरी बेटी, अब जाओ विजय तुम्हारी है;
पतियों का बाल न बाँका हो, जब रक्षक कृष्ण मुरारी हैं ।

जब रक्षक कृष्ण मुरारी हैं, भव भय भंजन भय हारी हैं;
जब रक्षक कृष्ण मुरारी हैं, भव भय भंजन भय हारी हैं ।

दुख हरो द्वारिकानाथ

 तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी |

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी ||

यही सुना है दीनबन्धु तुम सबका दुख हर लेते |
जो निराश हैं उनकी झोली आशा से भर देते ||
अगर सुदामा होता मैं तो दौड़ द्वारका आता |
पाँव आँसुओं से धो कर मैं मन की आग बुझाता ||
तुम बनो नहीं अनजान, सुनो भगवान, करो मत देरी |
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी ||

जो भी शरण तुम्हारी आता, उसको धीर बंधाते |
नहीं डूबने देते दाता, नैया पार लगाते ||
तुम न सुनोगे तो किसको मैं अपनी व्यथा सुनाऊँ |
द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन और कहाँ मैं जाऊँ ||
प्रभु कब से रहा पुकार, मैं तेरे द्वार, करो मत देरी |
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी ||